Thursday, September 11, 2008

NAZM : INTEZAR




NAZM : INTEZAAR
Dr.AHMAD ALI BARQI AZMI

Gulbadan ghunch dahan zohra jabeen rashk e qamar

Lalah ru , maahlaqa,ghairat e sad lal o guhar

Aye meri jan e ghazal, aye meri manzoor e nazar

Ilteja tujhse yahi hai meri ba deeda e tar

Aa ki har lamha teri yaad mein jalta hai jigar

Aye meri jaan e ghazl aye meri manzoor e nazar

Hai tere dam se mere gulshan e hasti mein bahaar

Tu jo aa jaaye mera ghar ho gulistab bakenaar

Qabil e deed hai tere rukh e gulgoon ka nikhaar

Teri furqat mein nahin hai mujhe ek lamha qaraar

Mujhse milne mein too ab bahr e khuda der na kar

Aye meri jaan e ghzal aye meri manzoor e nazar


Hai tere gesu e mushkin se faza itar badosh

Tere dilkash lab o rukhsaar hain gharatgar e hoosh

Main hoon mushtaq e mulaqat basad josh o kharosh

Tujhse milne ki tamanna mein hai way eh aaghosh

Aa bhi jaa meri tamannaon ka ab khoon na kar

Aye meri jaan e ghazal aye meri manzoor e nazar

Saturday, September 6, 2008

Poetic Comment On "Ek Manzoom Afsana" by Rafi Tabassum

Aapka tarz e bayan hai khushgawar
Hai yeh afsanah nehaayat dilfegaar
kijiye aisa tareeqah akhteyaar
ho na "Sultanah kabhi bhi ashkbaar
hai zaroori fikro fan ka imtezaaj
ta ki ho yek kaam fakhr e rozgaar
Ho rahi hai masnavi maadoom ab
jo kabhi thi logon ke dil ka qaraar
jari rakhiye aap is takhleeq ko
Ta ki haasil kar sakein yeh iftekhaar
log pochhein yeh "Tabassum kaun hai
Jiska hai BARQI yeh adabi shaahkaar

Dr.Ahmad Ali Barqi Azmi

محترم رفیع تبسم صاحب
آداب و تسلیمات


آپ کا طرز بیاں ھے خوشگوار
ھے یہ افسانہ نھایت دلفگار
کیجئے ایسا طریقہ اختیار
ھو نہ" سلطانہ"کبھی بھی اشکبار
ھے ضروری فکروفن کا امتزاج
تا کہ ھو یہ کام فخر روزگار
ھورھی ھے مثنوی معدوم اب
جو کبھی تھی لوگوں کے دل کا قرار
جاری رکھئے آپ اس تخلیق کو
تاکہ حاصل کر سکیں یہ افتخار
لوگ پوچھیں یہ "تبسم" کون ھے
جس کا ھے برقی یہ ادبی شاھکار

ڈاکٹر احمدعلی برقی اعظمی

Friday, August 22, 2008

GHAZAL :DR.AHMAD ALI BARQI AZMI



GHAZAL

DR.AHMMAD ALI BARQI AZMI

Jalwagah e husn e fitrat hai nishan e zindagi

Su e manzil gamzan hai karwan e zindagi

Mahram e raz e azal hain rahrawan e raah e shauq

Ahl e dil jo hain samajhte hain zaban e zindagi

Hai junoon e inteha e shauq mera khizr e raah

Haath mein hai jiske ab meri kamaane e zndagi

Ek gham ho to bataaun tujhse main aye hamnashin

Lamha lamha de raha hoon imtehaan e zindagi

Ek toofan e hawadis aa rahaa hai baar baar

Ud na jaaye sar se mere saibaan e zindagi

Muntashir hai ab kitaab e zindagi ka har waraq

Hai mera sooz e duroon sharh e bayaan e zindagi

Rang jab layega mazloomon ki aanhoon ka asar

Gir padega us ke sar par aasmaan e zindagi

Zulm ka Ahmad Ali ho jaayega suraj ghuroob

Koi phir hoga na uska nauha khwan e zindagi

Sunday, August 10, 2008

ग़ज़ल





ग़ज़ल
डा. अहमद अली बर्क़ी आज़मी
सफर नया ज़िंदगी का तुमको न रास आए तो लौट आना
फेराक़ मे मेरे नीँद तुमको अगर न आए तो लौट आना
नहीँ है अब कैफ कोई बाक़ी तुम्हारे जाने से ज़िंदगी मेँ
तुम्हेँ भी रह रह के याद मेरी अगर सताए तो लौट आना
तेरे लिए मेरा दर हमेशा इसी तरह से खुला रहेगा
अगर कभी वापसी का दिल मेँ ख़याल आए तो लौट आना
बग़ैर तेरे बुझा बुझा है बहार का ख़ुशगवार मंज़र
तुझे भी यह ख़ुशगवार मंज़र अगर न भाए तो लौट आना
तुम्हारी सरगोशियाँ अभी तक वह मेरे कानोँ मेँ गूँजती हैँ
हसीन लमहा वह ज़िंदगी का जो याद आए तो लौट आना
ग़ज़ल सुनाऊँ मैँ किसको हमदम कि मेरी जाने ग़ज़ल तुम्ही हो
दोबारा वह नग़मए मोहब्बत जो याद आए तो लौट आना
ख़याल इसका नहीँ कि दुनिया हमारे बारे मेँ क्या कहेगी
जो कोई तुमसे न अपना अहदे वफ़ा निभाए तो लौट आना
है दिन मेँ बे कैफ क़लबे मुज़तर बहुत ही सब्र आज़मा हैँ रातेँ
तुम्हेँ भी ऐसे मे याद मेरी अगर सताए तो लौट आना
तुझे भी एहसास होगा कैसे शबे जुदाई गुज़र रही है
सँभालने से भी दिल जो तेरा संभल न पाए तो लौट आना
कभी न तू रह सकेगा मेरे बग़ैर बर्क़ी मुझे यक़ीँ है
ख़याल मेरा जो तेरे दिल से कभी न जाए तो लौट आना

Ghazal

Ghazal

Dr. Ahamad Ali Barqi Azmi

safar naya zindagi ka tumako n ras aae to laut aana

feraq me mere nind tumako agar n aae to laut aana

nahin hai ab kaif koee baqi tumhare jane se zindagi men

tumhen bhi rah rah ke yad meri agar satae to laut aana

tere lie mera dar hamesha isi tarah se khula rahega

agar kabhi vapasi ka dil men khayal aae to laut aana

bagair tere bujha bujha hai bahar ka khushagavar manzar

tujhe bhi yah khushagavar manzar agar n bhae to laut aana

tumhari saragoshiyan abhi tak vah mere kanon men goonjati hain

hasin lamaha vah zindagi ka jo yad aae to laut aana

gazal sunaoon main kisako hamadam ki meri jane gazal tumhi ho

dobara vah nagamae mohabbat jo yad aae to laut aana

khayal isaka nahin ki duniya hamare bare men kya kahegi

jo koee tumase n apana ahade vafa nibhae to laut aana

hai din men be kaif qalabe muzatar bahut hi sabr aazama hain raten

tumhen bhi aise me yad meri agar satae to laut aana

tujhe bhi ehasas hoga kaise shabe judaee guzar rahi hai

sanbhalane se bhi dil jo tera sanbhal n pae to laut aana

kabhi n too rah sakega mere bagair Barqi mujhe yaqin hai

khayal mera jo tere dil se kabhi n jae to laut aana

Friday, July 25, 2008

आज की ग़ज़ल डा.अहमद अली वर्की की ग़ज़लें और परिचय


आज की ग़ज़ल .
समकालीन ग़ज़ल को समर्पित मंच
FRIDAY, JULY 18, 2008
डा.अहमद अली वर्की की ग़ज़लें और परिचय











25 दिसंबर 1954 को जन्मे डा. अहमद अली 'बर्क़ी' साहब तबीयत से शायर हैं.

शायर का परिचय ख़ुद बक़ौल शायर :

मेरा तआरुफ़

शहरे आज़मगढ है बर्क़ी मेरा आबाई वतन
जिसकी अज़मत के निशां हैं हर तरफ जलवा फेगन

मेरे वालिद थे वहां पर मर्जए अहले नज़र
जिनके फ़िक्रो— फ़न का मजमूआ है तनवीरे सुख़न

नाम था रहमत इलाही और तख़ल्लुस बर्क़ था
ज़ौफ़ेगन थी जिनके दम से महफ़िले शेरो सुख़न

आज मैं जो कुछ हूँ वह है उनका फ़ैज़ाने नज़र
उन विरसे में मिला मुझको शऊरे —फिकरो —फ़न

राजधानी देहली में हूँ एक अर्से से मुक़ीम
कर रहा हूँ मैं यहां पर ख़िदमते अहले वतन

रेडियो के फ़ारसी एकाँश से हूँ मुंसलिक
मेरा असरी आगही बर्क़ी है मौज़ूए सुख़न .


डा. अहमद अली बर्की़ आज़मी साहब की तीन ग़ज़लें

१.









सता लें हमको, दिलचस्पी जो है उनकी सताने में
हमारा क्या वो हो जाएंगे रुस्वा ख़ुद ज़माने में

लड़ाएगी मेरी तदबीर अब तक़दीर से पंजा
नतीजा चाहे जो कुछ हो मुक़द्दर आज़माने में

जिसे भी देखिए है गर्दिशे हालात से नाला
सुकूने दिल नहीं हासिल किसी को इस ज़माने में

वो गुलचीं हो कि बिजली सबकी आखों में खटकते हैं
यही दो चार तिनके जो हैं मेरे आशियाने में

है कुछ लोगों की ख़सलत नौए इंसां की दिल आज़ारी
मज़ा मिलता है उनको दूसरों का दिल दुखाने में

अजब दस्तूर—ए—दुनिया— ए —मोहब्बत है , अरे तौबा
कोई रोने में है मश़ग़ूल कोई मुस्कुराने में

पतंगों को जला कर शमए—महफिल सबको ऐ 'बर्क़ी'!
दिखाने के लिए मसरूफ़ है आँसू बहाने में.


बहर—ए—हज़ज=1222,1222,1222,1222

२.









नहीं है उसको मेरे रंजो ग़म का अंदाज़ा
बिखर न जाए मेरी ज़िंदगी का शीराज़ा

अमीरे शहर बनाया था जिस सितमगर को
उसी ने बंद किया मेरे घर का दरवाज़ा

सितम शआरी में उसका नहीं कोई हमसर
सितम शआरों में वह है बुलंद आवाज़ा

गुज़र रही है जो मुझपर किसी को क्या मालूम
जो ज़ख़्म उसने दिए थे हैं आज तक ताज़ा

गुरेज़ करते हैं सब उसकी मेज़बानी से
भुगत रहा है वो अपने किए का ख़मियाज़ा

है तंग का़फिया इस बहर में ग़ज़ल के लिए
दिखाता वरना में ज़ोरे क़लम का अंदाज़ा

वो सुर्ख़रू नज़र आता है इस लिए 'बर्क़ी'!
है उसके चेहरे का, ख़ूने जिगर मेरा, ग़ाज़ा

बह्र—ए—मजत्तस= 1212,1122,1212,112
**
अमीरे शहर=हाकिम; सितम शआरी-=ज़ुल्म; हमसर= बराबर का

सितम शआर=ज़लिम, ग़ाज़ा=क्रीम, बुलंद आवाज़ा-=मशहूर


३.









दर्द—ए—दिल अपनी जगह दर्द—ए—जिगर अपनी जगह
अश्कबारी कर रही है चश्मे—ए—तर अपनी जगह

साकित—ओ—सामित हैं दोनों मेरी हालत देखकर
आइना अपनी जगह आइनागर अपनी जगह

बाग़ में कैसे गुज़ारें पुर—मसर्रत ज़िन्दगी
बाग़बाँ का खौफ़ और गुलचीं का डर अपनी जगह

मेरी कश्ती की रवानी देखकर तूफ़ान में
पड़ गए हैं सख़्त चक्कर में भँवर अपनी जगह

है अयाँ आशार से मेरे मेरा सोज़—ए—दुरून
मेरी आहे आतशीं है बेअसर अपनी जगह

हाल—ए—दिल किसको सुनायें कोई सुनता ही नहीं
अपनी धुन में है मगन वो चारागर अपनी जगह

अश्कबारी काम आई कुछ न 'बर्क़ी'! हिज्र में
सौ सिफ़र जोड़े नतीजा था सिफ़र अपनी जगह

बहरे रमल(२१२२ २१२२ २१२२ २१२ )

संपर्क:

aabarqi@gmail.com

DR.AHMAD ALI BARQI AZMI

598/9, Zakir Nagar, Jamia Nagar

New Delhi-11025
अब तक प्रकाशित शायरों की सूची.
Aaj kee GHazal
• डा.अहमद अली वर्की की ग़ज़लें और परिचय
7/19/2008
25 दिसंबर 1954 को जन्मे डा. अहमद अली 'बर्क़ी'…
• देवमणि पांडेय की ग़ज़लें और परिचय
7/8/2008
परिचय: 4 जून 1958 को सुलतानपुर (उ.प्र.) में जन्मे…
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7/1/2008
परिचय:13 जून 1937 को वज़ीराबाद (अब पकिस्तान में) जन्मे…
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6/23/2008
परिचय: 11 अक्तूबर 1933 को जन्मे जनाब—ए—कृश्न कुमार 'तूर'…
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6/12/2008
'सरवर' 16 मार्च 1935 को मध्य प्रदेश में जन्मे…
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परिचय 5 अप्रैल, 1938 को ज्वालामुखी (हिमाचल प्रदेश) में…
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5/27/2008
परिचय: जन्म तिथि: 5 अगस्त,1950 जन्मस्थान: चंदेरी (ज़िला:गुना,म.प्र.) प्रकाशित…
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3/17/2008
पाँच ग़ज़लें 1.यह ग़ज़ल रमल की एक सूरत.फ़ायलातुन, फ़ायलातुन,फ़ा…
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