Friday, August 22, 2008

GHAZAL :DR.AHMAD ALI BARQI AZMI



GHAZAL

DR.AHMMAD ALI BARQI AZMI

Jalwagah e husn e fitrat hai nishan e zindagi

Su e manzil gamzan hai karwan e zindagi

Mahram e raz e azal hain rahrawan e raah e shauq

Ahl e dil jo hain samajhte hain zaban e zindagi

Hai junoon e inteha e shauq mera khizr e raah

Haath mein hai jiske ab meri kamaane e zndagi

Ek gham ho to bataaun tujhse main aye hamnashin

Lamha lamha de raha hoon imtehaan e zindagi

Ek toofan e hawadis aa rahaa hai baar baar

Ud na jaaye sar se mere saibaan e zindagi

Muntashir hai ab kitaab e zindagi ka har waraq

Hai mera sooz e duroon sharh e bayaan e zindagi

Rang jab layega mazloomon ki aanhoon ka asar

Gir padega us ke sar par aasmaan e zindagi

Zulm ka Ahmad Ali ho jaayega suraj ghuroob

Koi phir hoga na uska nauha khwan e zindagi

Sunday, August 10, 2008

ग़ज़ल





ग़ज़ल
डा. अहमद अली बर्क़ी आज़मी
सफर नया ज़िंदगी का तुमको न रास आए तो लौट आना
फेराक़ मे मेरे नीँद तुमको अगर न आए तो लौट आना
नहीँ है अब कैफ कोई बाक़ी तुम्हारे जाने से ज़िंदगी मेँ
तुम्हेँ भी रह रह के याद मेरी अगर सताए तो लौट आना
तेरे लिए मेरा दर हमेशा इसी तरह से खुला रहेगा
अगर कभी वापसी का दिल मेँ ख़याल आए तो लौट आना
बग़ैर तेरे बुझा बुझा है बहार का ख़ुशगवार मंज़र
तुझे भी यह ख़ुशगवार मंज़र अगर न भाए तो लौट आना
तुम्हारी सरगोशियाँ अभी तक वह मेरे कानोँ मेँ गूँजती हैँ
हसीन लमहा वह ज़िंदगी का जो याद आए तो लौट आना
ग़ज़ल सुनाऊँ मैँ किसको हमदम कि मेरी जाने ग़ज़ल तुम्ही हो
दोबारा वह नग़मए मोहब्बत जो याद आए तो लौट आना
ख़याल इसका नहीँ कि दुनिया हमारे बारे मेँ क्या कहेगी
जो कोई तुमसे न अपना अहदे वफ़ा निभाए तो लौट आना
है दिन मेँ बे कैफ क़लबे मुज़तर बहुत ही सब्र आज़मा हैँ रातेँ
तुम्हेँ भी ऐसे मे याद मेरी अगर सताए तो लौट आना
तुझे भी एहसास होगा कैसे शबे जुदाई गुज़र रही है
सँभालने से भी दिल जो तेरा संभल न पाए तो लौट आना
कभी न तू रह सकेगा मेरे बग़ैर बर्क़ी मुझे यक़ीँ है
ख़याल मेरा जो तेरे दिल से कभी न जाए तो लौट आना

Ghazal

Ghazal

Dr. Ahamad Ali Barqi Azmi

safar naya zindagi ka tumako n ras aae to laut aana

feraq me mere nind tumako agar n aae to laut aana

nahin hai ab kaif koee baqi tumhare jane se zindagi men

tumhen bhi rah rah ke yad meri agar satae to laut aana

tere lie mera dar hamesha isi tarah se khula rahega

agar kabhi vapasi ka dil men khayal aae to laut aana

bagair tere bujha bujha hai bahar ka khushagavar manzar

tujhe bhi yah khushagavar manzar agar n bhae to laut aana

tumhari saragoshiyan abhi tak vah mere kanon men goonjati hain

hasin lamaha vah zindagi ka jo yad aae to laut aana

gazal sunaoon main kisako hamadam ki meri jane gazal tumhi ho

dobara vah nagamae mohabbat jo yad aae to laut aana

khayal isaka nahin ki duniya hamare bare men kya kahegi

jo koee tumase n apana ahade vafa nibhae to laut aana

hai din men be kaif qalabe muzatar bahut hi sabr aazama hain raten

tumhen bhi aise me yad meri agar satae to laut aana

tujhe bhi ehasas hoga kaise shabe judaee guzar rahi hai

sanbhalane se bhi dil jo tera sanbhal n pae to laut aana

kabhi n too rah sakega mere bagair Barqi mujhe yaqin hai

khayal mera jo tere dil se kabhi n jae to laut aana

Friday, July 25, 2008

आज की ग़ज़ल डा.अहमद अली वर्की की ग़ज़लें और परिचय


आज की ग़ज़ल .
समकालीन ग़ज़ल को समर्पित मंच
FRIDAY, JULY 18, 2008
डा.अहमद अली वर्की की ग़ज़लें और परिचय











25 दिसंबर 1954 को जन्मे डा. अहमद अली 'बर्क़ी' साहब तबीयत से शायर हैं.

शायर का परिचय ख़ुद बक़ौल शायर :

मेरा तआरुफ़

शहरे आज़मगढ है बर्क़ी मेरा आबाई वतन
जिसकी अज़मत के निशां हैं हर तरफ जलवा फेगन

मेरे वालिद थे वहां पर मर्जए अहले नज़र
जिनके फ़िक्रो— फ़न का मजमूआ है तनवीरे सुख़न

नाम था रहमत इलाही और तख़ल्लुस बर्क़ था
ज़ौफ़ेगन थी जिनके दम से महफ़िले शेरो सुख़न

आज मैं जो कुछ हूँ वह है उनका फ़ैज़ाने नज़र
उन विरसे में मिला मुझको शऊरे —फिकरो —फ़न

राजधानी देहली में हूँ एक अर्से से मुक़ीम
कर रहा हूँ मैं यहां पर ख़िदमते अहले वतन

रेडियो के फ़ारसी एकाँश से हूँ मुंसलिक
मेरा असरी आगही बर्क़ी है मौज़ूए सुख़न .


डा. अहमद अली बर्की़ आज़मी साहब की तीन ग़ज़लें

१.









सता लें हमको, दिलचस्पी जो है उनकी सताने में
हमारा क्या वो हो जाएंगे रुस्वा ख़ुद ज़माने में

लड़ाएगी मेरी तदबीर अब तक़दीर से पंजा
नतीजा चाहे जो कुछ हो मुक़द्दर आज़माने में

जिसे भी देखिए है गर्दिशे हालात से नाला
सुकूने दिल नहीं हासिल किसी को इस ज़माने में

वो गुलचीं हो कि बिजली सबकी आखों में खटकते हैं
यही दो चार तिनके जो हैं मेरे आशियाने में

है कुछ लोगों की ख़सलत नौए इंसां की दिल आज़ारी
मज़ा मिलता है उनको दूसरों का दिल दुखाने में

अजब दस्तूर—ए—दुनिया— ए —मोहब्बत है , अरे तौबा
कोई रोने में है मश़ग़ूल कोई मुस्कुराने में

पतंगों को जला कर शमए—महफिल सबको ऐ 'बर्क़ी'!
दिखाने के लिए मसरूफ़ है आँसू बहाने में.


बहर—ए—हज़ज=1222,1222,1222,1222

२.









नहीं है उसको मेरे रंजो ग़म का अंदाज़ा
बिखर न जाए मेरी ज़िंदगी का शीराज़ा

अमीरे शहर बनाया था जिस सितमगर को
उसी ने बंद किया मेरे घर का दरवाज़ा

सितम शआरी में उसका नहीं कोई हमसर
सितम शआरों में वह है बुलंद आवाज़ा

गुज़र रही है जो मुझपर किसी को क्या मालूम
जो ज़ख़्म उसने दिए थे हैं आज तक ताज़ा

गुरेज़ करते हैं सब उसकी मेज़बानी से
भुगत रहा है वो अपने किए का ख़मियाज़ा

है तंग का़फिया इस बहर में ग़ज़ल के लिए
दिखाता वरना में ज़ोरे क़लम का अंदाज़ा

वो सुर्ख़रू नज़र आता है इस लिए 'बर्क़ी'!
है उसके चेहरे का, ख़ूने जिगर मेरा, ग़ाज़ा

बह्र—ए—मजत्तस= 1212,1122,1212,112
**
अमीरे शहर=हाकिम; सितम शआरी-=ज़ुल्म; हमसर= बराबर का

सितम शआर=ज़लिम, ग़ाज़ा=क्रीम, बुलंद आवाज़ा-=मशहूर


३.









दर्द—ए—दिल अपनी जगह दर्द—ए—जिगर अपनी जगह
अश्कबारी कर रही है चश्मे—ए—तर अपनी जगह

साकित—ओ—सामित हैं दोनों मेरी हालत देखकर
आइना अपनी जगह आइनागर अपनी जगह

बाग़ में कैसे गुज़ारें पुर—मसर्रत ज़िन्दगी
बाग़बाँ का खौफ़ और गुलचीं का डर अपनी जगह

मेरी कश्ती की रवानी देखकर तूफ़ान में
पड़ गए हैं सख़्त चक्कर में भँवर अपनी जगह

है अयाँ आशार से मेरे मेरा सोज़—ए—दुरून
मेरी आहे आतशीं है बेअसर अपनी जगह

हाल—ए—दिल किसको सुनायें कोई सुनता ही नहीं
अपनी धुन में है मगन वो चारागर अपनी जगह

अश्कबारी काम आई कुछ न 'बर्क़ी'! हिज्र में
सौ सिफ़र जोड़े नतीजा था सिफ़र अपनी जगह

बहरे रमल(२१२२ २१२२ २१२२ २१२ )

संपर्क:

aabarqi@gmail.com

DR.AHMAD ALI BARQI AZMI

598/9, Zakir Nagar, Jamia Nagar

New Delhi-11025
अब तक प्रकाशित शायरों की सूची.
Aaj kee GHazal
• डा.अहमद अली वर्की की ग़ज़लें और परिचय
7/19/2008
25 दिसंबर 1954 को जन्मे डा. अहमद अली 'बर्क़ी'…
• देवमणि पांडेय की ग़ज़लें और परिचय
7/8/2008
परिचय: 4 जून 1958 को सुलतानपुर (उ.प्र.) में जन्मे…
• प्राण शर्मा की दो ग़ज़लें.
7/1/2008
परिचय:13 जून 1937 को वज़ीराबाद (अब पकिस्तान में) जन्मे…
• कृश्न कुमार 'तूर' जी की ग़ज़लें
6/23/2008
परिचय: 11 अक्तूबर 1933 को जन्मे जनाब—ए—कृश्न कुमार 'तूर'…
• श्री सरवर आलम राज़ 'सरवर'
6/12/2008
'सरवर' 16 मार्च 1935 को मध्य प्रदेश में जन्मे…
• श्री सुरेश चन्द्र 'शौक़' जी की ग़ज़लें
6/5/2008
परिचय 5 अप्रैल, 1938 को ज्वालामुखी (हिमाचल प्रदेश) में…
• ज़हीर कुरैशी जी की ग़ज़लें..
5/27/2008
परिचय: जन्म तिथि: 5 अगस्त,1950 जन्मस्थान: चंदेरी (ज़िला:गुना,म.प्र.) प्रकाशित…
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5/14/2008
परिचय 46 वर्षीय श्री बृज कुमार अग्रवाल (आई. ए. एस.)…
• पवनेन्द्र ‘ पवन ’ की दो ग़ज़लें और परिचय
5/5/2008
परिचय नाम: पवनेन्द्र ‘पवन’ जन्म तिथि: 7 मई 1945.…
• अमित "रंजन गोरखपुरी" की ग़ज़ल व परिचय
4/21/2008
परिचय: उपनाम- रंजन गोरखपुरी वस्तविक नाम- अमित रंजन चित्रांशी…
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4/10/2008
उम्र: 36 साल शिक्षा: बी.ए.(1994) निवास: फ़रीदाबाद (हरियाणा) पहली…
• देवी नांगरानी जी की एक ग़ज़ल और परिचय
4/9/2008
परिचयजन्म- 11 मई 1949 को कराची में शिक्षा- बी.ए.…
• कवि कुलवंत जी की एक ग़ज़ल
3/31/2008
नाम : कवि कुलवंत सिंह जन्म: 1967 उतरांचल(रुड़की) शिक्षा:…
• डा. प्रेम भारद्वाज जी की तीन ग़ज़लें
3/28/2008
डा. प्रेम भारद्वाज जन्म: 25 दिसम्बर ,1946. नगरोटा बगवाँ…
• द्विज जी की पांच ग़ज़लें
3/17/2008
पाँच ग़ज़लें 1.यह ग़ज़ल रमल की एक सूरत.फ़ायलातुन, फ़ायलातुन,फ़ा…
• मेरे गुरु जी का परिचय और उनकी ग़ज़लें
3/15/2008
नाम: द्विजेन्द्र ‘द्विज’ पिता का नाम: स्व. मनोहर शर्मा‘साग़र’…

मुशायरा/कवि-सम्मेलन “बरखा-बहार” भाग 2

मुशायरा/कवि-सम्मेलन “बरखा-बहार” भाग 2
महावीर
July 22, 2008
मुशायरा/कवि-सम्मेलन “बरखा-बहार” भाग 2
Filed under: प्राण शर्मा, महावीर शर्मा, सामान्य/General — महावीर @ 12:02 am
मुशायरा/कवि-सम्मेलन “बरखा-बहार” भाग 2

आदरणीय प्रधान जी, कवियों, कवियत्रियों और श्रोतागण को आपके सेवक (महावीर शर्मा) और श्री प्राण शर्माजी का नमस्कार।
‘बरखा-बहार’ पर १५ जुलाई २००८ के मुशायरे का अभी भी ख़ुमार बाक़ी है। आज जो गुणवान कवि और कवियत्रियां अपना अमूल्य समय देकर रचनाओं से इस कवि-सम्मेलन की शोभा बढ़ा रहे हैं, उन्हें मैं विनम्रतापूर्वक प्रणाम करता हूं। आप सभी श्रोताओं का हार्दिक स्वागत है।
श्री महावीर जी का मैं बहुत आभारी हूं जिन्हों ने कवि सम्मेलन में शामिल कर, अहमद अली ‘बर्क़ी’ आज़मी, देवमणि पांडेय, द्विजेन्द्र ‘द्विज’, समीर लाल ‘समीर’, पारुल, रज़िया अकबर मिर्ज़ा, डॉ. मुंजु लता, नीरज गोस्वामी, राकेश खंडेलवाल, नीरज त्रिपाठी, रंजना भाटिया ‘रंजू’, सतपाल ‘ख़्याल’ जैसे गुणी कवियों और कवियत्रियों के साथ पढ़ने का सुनहरा मौक़ा दिया है।

यहां यह कहना उचित होगा कि यह कवि-सम्मेलन हमारे यू.के. के प्रितिष्ठित कवि, लेखक, समीक्षक और ग़ज़लकार श्री प्राण शर्मा जी की ही प्रेरणा और सुझाव से आयोजित किया किया गया है जिनका मार्गदर्शन पग-पग पर मिलता रहा है। आप ग़ज़ल की दुनिया में एक जाने माने उस्ताद हैं।


(वाह! वाह! के साथ तालियों से हॉल गूंज उठा है।)
***
आज हमें बेहद खुशी है कि हमारे दरमियान जनाब डॉ. अहमद अली बर्क़ी आज़मी साहेब मौजूद हैं। आपको शायरी का फ़न विरसे में मिला है। आप मशहूर शायर जनाब बर्क़ साहेब के बेटे हैं जो जनाब नूह नारवी के शागिर्द थे। जनाब नूह नारवी साहेब दाग़ देहलवी के शागिर्द थे।
डॉ. बर्क़ी साहेब ने फ़ारसी में पी.एच.डी. हासिल की है और आजकल ऑल इंडिया रेडियो में ऐक्स्टर्नल सर्विसिज़ डिवीज़न के पर्शियन (फ़ारसी) सर्विस में ट्रांस्लेटर/अनाउंसर/ब्रॉडकास्टर की हैसियत से काम कर रहे हैं। आप का तआरुफ़ आज की ग़ज़ल
में देखा जा सकता है।
मैं जनाब डॉ. अहमद अली ‘बर्क़ी’ साहेब से दरख़्वास्त करता हूं कि माइक पर आकर अपने कलाम से इस मुशायरे की शान बढ़ाएं :
जनाब अहमद अली ‘बर्क़ी’:

खिल उठा दिल मिसले ग़ुंचा आते ही बरखा बहार
ऐसे मेँ सब्र आज़मा है मुझको तेरा इंतेज़ार
आ गया है बारिशोँ मेँ भीग कर तुझ पर निखार
है नेहायत रूह परवर तेरी ज़ुल्फ़े मुश्कबार
जलवागाहे हुस्ने फितरत है यह दिलकश सबज़ाज़ार
सब से बढकर मेरी नज़रोँ मे है लेकिन हुस्ने यार
ज़िंदगी बे कैफ है मेरे लिए तेरे बग़ैर
गुलशने हस्ती मेँ मेरे तेरे दम से है बहार
है जुदाई का तसव्वुर ऐसे मेँ सोहाने रूह
आ भी जा जाने ग़ज़ल मौसम है बेहद साज़गार
ग़ुचा वो गुल हंस रहे हैँ रो रहा है दिल मेरा
इमतेहाँ लेती है मेरा गर्दिशे लैलो नहार
साज़े फ़ितरत पर ग़ज़लख़्वाँ है बहारे जाँफेज़ा
क़ैफ़—ओ— सरमस्ती से हैँ सरशार बर्क़ी बर्गो बार
(श्रोतागण खड़े होकर तालियों से ‘बर्क़ी’ साहेब के धन्यवाद और दाद का इज़हार कर रहे हैं।)
जनाब डॉ. बर्क़ी साहेब आपकी शिरकत के लिए हम सभी तहे दिल से ममनून और शुक्रगुज़ार हैं। उम्मीद है कि आगे होने वाले मुशायरों में भी आपकी राहनुमाई मिलती रहेगी।
***
“छ्म छम छम दहलीज़ पे आई मौसम की पहली बारिश
गूंज उठी जैसे शहनाई मौसम की पहली बारिश”

Barkha Bahaar